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تلك الليلة المظلمة

خاص- ثقافات

*محيي الدين كانون

بسْمتُكِ الغامضةُ  تؤبدني   وراءَ  أمواجكِ  العالية….

من  بحر  لُجٌاج ِ…

و حينَ  يترقرق  صوتُك ِ  العذْبِ ِ  كالنّهر ِ ِ ….

يجرفني    إلى   نهاية ِ  مصبْه ِ   الأقصى …

فأغرقُ  هناكَ   و أكابدُ   هناكّ  ما   بين  بحْرك  ِ و نهْرك ِ…

وأعلمُ    أنّه ليس   في  ألحُبِّ   من  طوْق ٍ أو  نجاة ٍ …

لا  في   الحلو   ولا  في  المالح….

2

قال  لي  العصفورُ   الأبيضُ  المسكين  :

أنت  لم   تخلقْ   الهواءَ…!

و لم  تخلقْ  أجنحتي البيضاءَ … !

أو   حتى تعلمني  أبجدية  الطيران ..!

ومع   ذلك   أَنْتِ   سجّاني…؟!

3
ليبيا   حسناءُ   المتوسط …

يراودها  دائما  بصخبه  وموجه  هذا  الفتى

المجنون…!

كعادتها  هي  دائماً  متجددةٌ   له …

و حينما  ينبلج ُ  اللاّزورْدِي …

يرتدي لها -الزِّي الليبي  في  يناعة  أُبْهتهُ…

فتزدهي هي -بزهر اللوز ..

وتتعطر  بشذى  الورد ….

وعند الغسق  يتعانقان …

ثم  ينامان   في المدى   حباً  عذباً  خرافياً..!

4

يا أنشودةُ  البساطةِ  و يا نسيم ُ   السلام ِ…!

مهما  كان  ضِعْفُنا ….!

لا تغيبي  عنَّا  يا  حبيبتي…رُغّمَ  قسوتِك ِ الجارحة ِ…

فأنتِ العزاءُ  والفضيلةُ  والحبُّ الشجاعِ ..!

كما  انتِ ِ أيتها  الحقيقة  كم  أُحِبُّك ِ  يا  حبيبتي…!

هكذاِ  عاريةٌ   دون   أصباغ …

سكبتْ  ماء  الحُبِّ   من   سِهْم ِ عينيها  اليانعتين…

وكانت  الشمس  وراءَها   أحْلى   من  فطيرة  العسل …

عندما  غابتْ    التي  أضرمت   نار َ  الحُبِّ …

عرفتُ   أن  العاشق َ  شحاذُ  مسكين  و ضرير … .

6

مشي  متوحداً  إلى  قمة  الجبل  يوماً  بحاله  و ليلة

بحالها….

عِنْدَ  القمةِ  هبّتْ  ريحُ  رخيّةُ…

أستردَّ أنفاسَه  على  صباح   اللاّزورْدِي  مُشَعْشعٍ …

وحين   رأى  ما  تحته   بسفح   الجبْلِ …

قال : لقد  أخطأتُ   الطريقَ …..

7
في  المساءِ  بعينين  دبقتين  يجوسُ   فيهما  طائرُ

الحُبِّ..

قلت لها سأبرح  عينيكِ حتْماً …

وأهْجر  قلبك  إلى  الأبْدِ …

ولن أعود .. فوداعاً .. !

لم  أنمْ  تلك  الليلة  المظلمة…

وحين  تجلّى   الصباحُ   …..

قلت لها بعينين دبقتين ….:

لا يمكن ان أتخلى عنك  أبْداً  يا شمسي المشرقة….

8
ها هى الأرض في هذا  الصباح   مستلقية  تحت

الشمس…

بعشبهاً  اليانع  وبقطرات  نداها…

وبعد أن  تهاطلت  عليْنا   نجوم  الحُبِّ   ليلة  البارحة…

وكما  توهج  فتيل الحُبِّ  مدى  ليلة  بحالها…

ففي هذا الصّباحِ  أضرم   الحُبُّ   نيرانه  مجدداً  …

*شاعر  وروائي  من  ليبيا .

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